पंचायती राज व्यवस्था और महिलाएं

 

अंजली कुमारी1] ऋचा सिंह2

1शोधाथीर्] राजनीति विज्ञान] नीलाम्बर पीताम्बर विश्वविद्यालय] मेदिनीननगर] पलामू] झारखण्ड] भारत।

2शोध निर्देशिका, असिस्टेंट प्रोफेसर, विभागाध्य़क्ष राजनीति विज्ञान विभाग, जी.एल.ए. कॉलेज, नीलाम्बर-पीताम्बर विश्वविद्यालय, मेदिनीनगर, पलामू] झारखण्ड] भारत।

*Corresponding Author E-mail:

 

ABSTRACT:

वर्तमान राजनीति लोकतन्त्र की प्रथम पाठशाला है। लोकतन्त्र मूलतः विकेन्द्रीकरण पर आधारित शासन व्यवस्था होती है। शासन की ऊपरी सतहों पर (केन्द्रीय तथा राज्य) कोई भी लोकतन्त्र तब तक सफल नहीं हो सकता. जब तक कि निचले स्तर पर लोकतांत्रिक मान्यतायें एवं मूल्य शक्तिशाली नहीं हो। लोकतान्त्रिक राजनीतिक व्यवस्था में पंचायतीराज ही वह माध्यम है, जो शासन को सामान्य जन के दरवाजे तक लाता है। पंचायतीराज व्यवस्था में स्थानीय लोगों की स्थानीय शासन कार्यों में अनवरत रूचि बनी रहती है, क्योंकि वे अपनी स्थानीय समस्याओं का स्थानीय पद्धति से लागू करते एवं समाधान भी कर सकते हैं। इस प्रकार पंचायतीराज संस्थायें स्थानीय जनमानस को शासन कार्य में भागीदार एवं हिस्सेदार बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देती है और उसी भागीदारी की प्रक्रिया के माध्यम से लोगों की प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से राजनीति का प्रशिक्षण स्वत ही प्राप्त होता है। वर्तमान पंचायतीराज में स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण प्राप्त कर के ये स्थानीय जनप्रतिनिधि ही कालान्तर में विधान सभा एवं राज सभा एवं संसद का प्रतिनिधित्व कर राष्ट्र को नेतृत्व प्रदान करते है।

 

KEYWORDS: लोकतांत्रिक, विकेंद्रीकरण, राजनीतिक, महिला सशक्तिकरण, पंचायती राज।

 


 


izLrkouk %&

पंचायती राज व्यवस्था, ग्रामीण भारत की स्थानीय स्वशासन की प्रणाली है। जिस तरह से नगरपालिकाओं तथा उपनगरपालिकाओं के द्वारा शहरी क्षेत्रों का स्वशासन चलता है, उसी प्रकार पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों का स्वशासन चलता है। 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से भारत की ग्रामीण संरचना को सशक्त करने का प्रयास किया गया है, जिसमें न केवल पुरुष बल्कि महिलाओं की भी राजनीतिक भागीदारी को एक ठोस आकार प्रदान किया गया है। पंचायत स्तर परमहिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है, संविधानतः महिलाएं राजनीतिक रूप से सशक्त हुई हैं।1 पंचायती राज के माध्यम से महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में परिवर्तन हुआ है। या कहें उन्हें एक नया जीवन प्राप्त हुआ है तो दूसरी ओर ऐसे भी उदाहरण है, जहाँ महिलाओं को पंचायतों में वास्तविक भागीदारी प्राप्त नहीं हो सकी है। इस आलेख के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की भूमिका और निर्वाचित महिला नेताओं के समक्ष आने वाली समस्याओं और चुनौतियों को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है।

 

प्राचीन काल में भी स्वशासन की व्यवस्था थी। अपितु अर्थशास्त्र, महाभारत और मनुस्मृति में ग्राम-संघ विद्यमान होने का अनेकों स्थानो पर उल्लेख मिलता है। यह ग्राम संघ, ग्राम सभाओं या पंचायतों के प्रतिनिधि स्थानीय स्वशासन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। भारत की अधिकांश जनता ग्राम में निवास करती है, अतः वर्तमान पंचायतीराज स्वशासन में उनका प्रतिनिधित होने के कारण भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में आरम्भ से ही इनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती थी। ऋग्वेद में गाँव के मुखिया के रूप में ग्रामिनी का उल्लेख मिलता है।2 कालान्तर में समय के साथ इसका स्वरूप कई बार बदला। ऋग्वेद में उल्लेखित ’सभा’तथा ’समिति’जैसी संस्थायें अपने को अनुरक्षित न रख पायी पर ग्राम स्तरीय ग्राम-संघ, ग्राम-सभायें तथा पंचायतें किसी न किसी रूप में विद्यमान रही।

 

झारखंड पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की भूमिका लोकतन्त्र को मानव गरिमा, व्यक्ति की स्वतन्त्रता एवं समानता, राजनीतिक निर्णयों में जनभागीदारी के कारण शासन का श्रेष्ठतम रूप माना जाता है। लोकतंत्र न केवल एक राजनीतिक परिस्थिति या सरकार चलाने का एक तरीका है, बल्कि यह एक देश की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति को भी दर्शाता है। लोकतंत्र भी एक विशेष प्रकार की सरकार, एक विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था, एक विशेष दृष्टिकोण और एक विशिष्ट जीवन शैली है। लोकतंत्र का सार लोगों की भागीदारी और नियंत्रण में निहित है।3 लोकतंत्र का आधार शासन में जनता की भागीदारी के साथ-साथ शासन का निम्न स्तर तक विकेंद्रीकरण है, उसी भावना का साकार स्वरूप पंचायती राज व्यवस्था है। गांधीजी ने अपने अंतिम सार्वजनिक लेख वसीयतनामे में लिखा था कि “सच्चा लोकतंत्र केंद्र में बैठे 10-20 लोगों द्वारा नहीं चलाया जा सकता, इसे गांव के हर आदमी द्वारा नीचे से चलाया जाना चाहिए।

 

73वें संविधान संशोधन अधिनियम 1999 के तहत अनुच्छेद 243 (डी) और 243 (टी) जोड़े गए जिसमें पंचायती राज के प्रत्येक स्तर पर कम से कम एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। झारखंड में पंचायती राज संस्थाओं में 56 प्रतिशत महिलाएं प्रतिनिधि हैं। झारखंड में 2360 मुखिया, 2444 पंचायत समिति सदस्य, 246 जिला परिषद् और 25698 वार्ड सदस्यों के पदों पर महिलाओं ने आरक्षण के कारण जीत हासिल की। पंचायतों में मुखिया के रूप में महिलाएं प्रतिनिधि होती हैं लेकिन महिला के प्रतिनिधि के बजाय उनके पति का वर्चस्व होता है। महिला प्रतिनिधि केवल नाममात्र के प्रतिनिधियों के लिए केवल हस्ताक्षर प्रतिनिधि मात्र बन कर रह गई हैं। पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं को कई अधिकार दिए गए हैं लेकिन जानकारी के अभाव में वे ठीक से काम नहीं कर पाती हैं। जानकारी होने पर भी पुरुषों द्वारा उनकी शक्ति का दुरुपयोग किया जाता है। महिलाएं जितनी अधिक आत्मनिर्भर होंगी, उनका प्रदर्शन उतना ही बेहतर होगा।4

 

झारखंड में पंचायत स्तर पर महिलाओं की अधिक भागीदारी के कारण स्थानीय स्तर पर उनके जीवन में बदलाव आया है। महिला प्रतिनिधियों की शक्ति ने न केवल जातीय रूप बल्कि आर्थिक और सामाजिक समीकरण को भी बदल दिया है। महिलाओं की शिक्षा, महिलाओं के आत्मविश्वास में वृद्धि, उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने पर जोर, राजनीति में महिलाओं की स्वीकृति को पंचायतों द्वारा बढ़ावा दिया गया है। पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से हर वर्ग की महिलाओं को आरक्षण देने और उन्हें ग्रामीण विकास से जोड़ने का प्रयास किया गया है। यदि इस कार्य में अधिक जागरूकता लाई जाए तो (चाहे मजदूरी रोजगार हो या स्वरोजगार) महिलाओं को विशेष महत्व देकर गांवों का विकास किया जा सकता है। पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण के प्रावधान से लेकर उनमें कई बदलाव देखने को मिले हैं। विकास की प्रक्रिया में महिलाओं की हिस्सेदारी में वृद्धि हुई है। सामाजिक रूप से वे बदल गए हैं और शिक्षा के क्षेत्र में सुधार हुआ है।5 पुरुषों के साथ काम करने में महिलाएं जिस चीज से झिझकती थीं या काम करने से डरती थीं वह अब कम हो रही है। अब वह आसानी से पंचायत स्तर के उच्चाधिकारियों से संपर्क स्थापित कर अपनी समस्याओं को उनके सामने रखने में सक्षम हैं। पिछड़े वर्ग की महिलाओं को अब केवल आरक्षण के माध्यम से राजनीति में भाग लेने का अवसर प्रदान किया गया है।

 

राष्ट्र का उन्नयन तभी समय है जब रथननीय स्तर से लेकर चोटी के शासन में जनसामान्य सभी वर्ग के पुरूषों एवं महिलाओं की सक्रिय भागीदारी हो। यह भागीदारी ही लोकतन्त्र का मापदण्ड निश्चित करती है।

 

भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति समय, काल और परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होती रही है। भारत में स्त्री के अनेक रूप है, यह ज्ञान, लक्ष्मी, विद्या, कला और सौन्दर्य की प्रतीक मानी जाती है।6 वेद ऋचायें रचने वाली, शास्त्रार्थ में जमने वाली, रण कौशल दिखलाने वाली और जौहर चिता सजाने वाली महिला भी भारत की ही नारी थी। बुद्धिमान और प्राणवान थी, भारत की नारियां कभी भी बेचारी नहीं थी, लेकिन वे आज क्यों बेचारी है, ये आज क्यों जीती बाजी हारती दीख रही है।7

 

सदियों से अबला कहलाने वाली भारत की नारी अब अबला नहीं है। अनपढ़ हो, कम पढी लिखी या उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली शिक्षित महिला अब बेबस नहीं है। भारत में अनेक समाज सुधार आन्दोलन के नेताओं ने स्त्री उद्वार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जिसमें राजा राम मोहन राय, स्वामी दयायन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, केशव दास, गोविन्द रानाडे और महात्मा गाँधी अग्रणी पंक्ति में आते है।8 स्वतन्त्रता के पश्चात स्त्री समाज में अपने अधिकारों एवं कर्त्तव्यों को लेकर नयी चेतना और जागृति का प्रादुर्भाव हुआ। कुछ महिलाओं  ने तो स्वतन्त्रता की लड़ाई में गांधी जी के आहवान से ही जग गयी थी, और वह देश को स्वतन्त्र कराने के लिए पुरुषों से कंधा से कंधा मिलाकर देश के विशाल रण-क्षेत्र में कूद पड़ी उस समय न तो उनकी अशिक्षा आडे आयी और न पति। पती के जेल जाने पर घर की आर्थिक स्थिति को सम्हाली और स्वयं के जेल जाने पर पीछे छूटे बच्चे की जिम्मेदारी ली।9

 

“गाँधी जी ने निर्माण में स्त्री की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि एक पुरूष के शिक्षित होने पर देश को श्रेष्ठ नागरिक प्राप्त होता है, जबकि एक स्त्री को शिक्षित करने पर देश को सर्वश्रेष्ठ परिवार की प्राप्ति होती है। ‘‘10

 

73वें संविधान संशोधन अधिनियम ने पंचायतीराज संस्थाओं के सभी स्तरों पर महिलाओं को तिहाई आरक्षण देकर नये अवसर देने का ऐसा कार्य किया है, जिसके महत्त्व को केवल राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, विश्व स्तर पर भी स्वीकार किया गया है। इसे स्वाधीन भारत के सबसे सार्थक कदमों में से एक माना जाना चाहिए। पर साथ ही यह भी कहना उचित होगा कि यदि महिलाओं के अधिकार और सुरक्षा के अन्य कदम साथ-साथ नहीं उठाये गये, तो इस आरक्षण से उत्पन्न अनेकों सम्भावनाओं का समाज में उचित उपयोग नहीं हो पायेगा।11

 

73वें संवधान संशोधन अधिनियम के द्वारा राजनीतिक के प्रत्येक स्तर पर महिलाओं के लिए एक तिहाई स्थान आरक्षित किये गये हैं। राजनीतिक में महिलाओं के लिए आरक्षण की घोषणा की प्रारम्भिक प्रतिक्रिया एक ओर तो उल्लास प्रदान करने वाली है ही, तो दूसरी ओर घबराहट और चिंता वाली भी है। सबसे बड़ी समस्या, पंचायत के तीनों स्तरों के लिए चुनाव के समय तक 7.95 लाख महिलाओं को ढूंढने की थी, ऐसी परिस्थित में पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं पुरुषों के आदेश, निरीक्षण तथा प्रतिनिधि के रूप में कोरे कागज पर अपने हस्ताक्षर करेंगी या अगूठा लगायेगी, परिणाम क्या होगा, महिलायें कानून के दलदल में फँसती चली जायेंगी या बाहर निकल जायेंगी।12

 

 

महिलाओं के लिए राजनीतिक में एवं स्थानीय स्वशासन में आरक्षण बहुत सोच-समझकर लिया गया कदम है। ग्रामीण समाज में महिलायें काफी पिछड़ी हुई है, और पुरुष वर्ग उन पर हावी हैं, यद्यपि ग्रामीण अर्थतन्त्र में महिलाओं का योगदान पुरूषों से कम नहीं है। पारित विधेयक में इसी असंगति को दूर करने का प्रयास किया गया है। इससे महिलाओं में एक नयी जागृति आयेगी, उनमें अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता उत्पन्न होगी. फलस्वरूप गाँवों में नारी शक्ति का उत्कर्ष दिन प्रतिदिन होगा। अनेक महिलाओं ने यह भय प्रकट किया है कि राजनीतिक में उनकी भागीदारी से उनके घरेलू दायित्वों पर प्रतिकूल प्रभाव पडेगा, निर्धन महिलाओं को कार्य तथा मजदूरी की हानि उठानी पड़ेगी और इसकी क्षतिपूर्ति की व्यवस्था इस प्रणाली में नहीं हैं।

 

राजनीतिक में महिलाओं की चुनौतियॉ के सम्बन्ध में तीन बातों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। सबसे पहले शिक्षा, प्रशिक्षण और आत्म सम्मान में सबसे बड़ी बाधा रही है। यद्यपि सरकार के प्रयासों के फलस्वरूप पिछले पांच दशकों में महिला साक्षरता बढी है। लेकिन अभी उनमें शिक्षा का स्तर निम्न है।13 देश के सम्पूर्ण महिलाओं का 74 प्रतिशत भाग गांवों में बसता है। लेकिन लगभग 18 प्रतिशत ग्रामीण महिलाएं ही शिक्षित हैं। संविधान संशोधन के द्वारा महिलाओं को राजनीतिक में अधिकार सम्पन्न बना दिया गया है। पर राजनीतिक में महिलाओं की चुनौतियॉ उनकी अधिकार सम्पन्नता के परिणाम अब दृष्टिगोचर हो रहे है। आज नयी समाज में राजनीतिक में विकास तथा महिला के सम्मान के प्रति जागरूकता के साथ प्रत्येक समाज में महिला सषक्त हुई है।  निष्कर्ष के रूप  हम कह सकते है कि राजनीतिक में महिलाओं की चुनौतियॉ तमाम प्रयासों के बावजूद कम नही है।

 

संदर्भ सूचीः-

1.    एम.एम.अंसारी (2023), महिला और मानवाधिकार, ज्योति प्रकाशन, जयपुर, पृ. 25

2.    मेनन निवेदिता एडि., जेंडर एण्ड पालिटिक्स इन इण्डिया, न्यू देहली, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, पृ०-379,

3.    जन० ऐ0रू 2005, वीमैन इन डेवलपमेंट, विकास पब्लिकेशन, नई दिल्ली, पृ0-23

4.    जे०सी० अग्रवाल, 2004, भारत में दलित नारी के अधिकार, विद्या विहार, नई दिल्ली, पृ0-110

5.    नुसवाम मारथा सी0, 2000, विमैन एण्ड ह्यूमन डेवलपमेंट, शारदा पब्लिकेशन, न्यू दिल्ली, पृ0 296  

6.    अग्रवाल वीणा, 2008, कैपबिलीटिज, फ्रीडम एण्ड क्वालिटी, ऑक्सफोर्ड पब्लिकेशन, न्यू दिल्ली, पृ0-179, पृ0-45, पृ0-145, पृ0-74

7.    वर्मा जे. एस. 2005, दि न्यू यूनीवर्स ऑफ ह्यूमन राइट्स यूनिवर्सल, लॉ पब्लिशिंग हाऊस, नई दिल्ली, पृ0-58, पृ0-117, पृ०-68

8.    चन्द्रशेखरम, 2006, एक्सेस ऑफ विमेन फ्राम लीडरशिप पोजीशंस अंडरमाइंस डेमोक्रेसी, निसार पब्लिकेशन, नई दिल्ली, पृ0-55. 

9.    जे०सी० अग्रवाल, 2004, भारत में नारी शिक्षा, विद्या विहार, नई दिल्ली, पृ0-110,

10.  डॉ० राम सिंह सैनी, 2007, मानवाधिकारों के विविध आयाम, गगनदीप पब्लिकेशन, पृ. 16

11.  कुरूक्षेत्र अपै्रल 2023, पंचायती राज, प्रधानमंत्री स्वामित्व योजना, विकास पब्लिकेशन, नई दिल्ली, पृ॰-22

12.  डॉ0 आर॰पी॰जोशी, (2023) पंचायतीराज चुनौतियां एवं संभावनाए पृ॰-86

13.  शंर्मा प्रज्ञा {2000}“भारतीय समाज में नारी की गौरवमयी यात्रा“पोइन्टर पब्लिशर्स जयपुर पृ॰-72

 

 

Received on 08.09.2025      Revised on 19.09.2025

Accepted on 27.09.2025      Published on 12.11.2025

Available online from November 19, 2025

Int. J. Ad. Social Sciences. 2025; 13(4):186-188.

DOI: 10.52711/2454-2679.2025.00029

©A and V Publications All right reserved

 

This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-ShareAlike 4.0 International License. Creative Commons License.